इस मुस्लिम देश में सैकड़ों साल पुराने हिंदू मंदिर में जल रही मां दुर्गा की अखंड ज्योत, ईरान से आने वाले भी यहां टेकते मत्था, अब नहीं आता यहां कोई भी श्रद्धालु

अजरबेजान. भारत में इन दिनों नवरात्रि की धूम है। अगले नौ दिनों तक भारत में देवी के नौ अवतारों की पूजा अर्जना की जाएगी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत से दूर यूरोप और एशिया के बीच एक मुस्लिम देश में मां दुर्गा का मंदिर है और यहां अखंड ज्योत जल रही है। पूर्वी यूरोप और एशिया के बीच एक मुस्लिम देश अजरबैजान है। यहां की 95% आबादी सिर्फ मुसलमानों की है। बावजूद इसके यहां सुराखानी में मां दुर्गा का 300 साल पुराना मंदिर है, जहां सैकड़ों सालों से लगातार अखंड ज्योत जल रही है। इस खूबी की वजह से इस मंदिर का नाम टेंपल ऑफ फायर रखा गया है। हालांकि, अब यहां न तो श्रद्धालुओं की भीड़ देती है और न ही जयकारे गूंजते हैं। (Azerbaijan)

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हिंदू और पारसी दोनों करते थे पूजा …

मंदिर सैकड़ों साल पुराना है। पुराने समय में रास्ते से होकर गुजरने वाले भारतीय व्यापारी यहां मत्था जरूर टेकते थे और मंदिर के पास बने कोठरियों में विश्राम करते थे। ईरान के पारसी लोग भी यहां पूजा करने आते थे। उन्हीं के कारण इसे आतेशगाह भी कहते हैं। उनके अनुसार यह एक पारसी मंदिर है। हालांकि इस मंदिर पर एक त्रिशुल होने के कारण पारसी विद्वानों ने इसकी जांच करके इसे एक हिन्दू स्थल बताया है।

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जोनस हैनवे (1712-1786)

नामक एक 18वीं सदी के यूरोपीय समीक्षक ने पारसियों और हिन्दुओं को एक ही श्रेणी का बताते हुए कहा कि ‘यह मत बहुत ही कम बदलाव के साथ प्राचीन भारतीयों और ईरानियों में, जिन्हें गेबेर या गौर कहते हैं। ‘गेबेर’ पारसियों के लिए एक फारसी शब्द है जबकि गौड़ हिन्दू ब्राह्मणों की एक जाति होती है।
– ऐसा कहा जाता है कि 1860 में यहां पूजा करने वाले पुजारी यहां से चले गए। फिर कोई पुजारी लौटकर नहीं आया। तब से इस मंदिर में श्रद्धालुओं का आना भी खत्म हो गया।

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किसने बनवाया था ये मंदिर?

ऐसा माना जाता है कि सैकड़ों सालों पहले भारतीय कारोबारी इस रास्ते से होकर जाते थे। ऐसे में इन लोगों ने मंदिर को बनवाया था। इतिहासकारों के मुताबिक, इसे बुद्धदेव नाम के किसी शख्स ने बनाया था, जो हरियाणा के कुरुक्षेत्र के पास मादजा गांव का रहने वाला था। वहां मौजूद एक अन्य शिलालेख के मुताबिक, उत्तमचंद व शोभराज ने भी मंदिर निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी।

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मध्यकाल है मंदिर, अब बन चुका है संग्रहालय…

हिंदू धर्म में अग्नि को बहुत पवित्र माना जाता है। इसलिए यहां जल रही ज्योति को साक्षात भगवती का रूप माना गया है। यहां एक प्राचीन त्रिशूल भी स्थापित है। मंदिर की दीवारों पर गुरुमुखी में लेख अंकित हैं। वहीं, मंदिर में प्राचीन वास्तुकला का उपयोग किया गया है।

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– बाकू आतेशगाह की दीवारों में जड़ा एक शिलालेख मौजूद है। इसकी पहली पंक्ति ‘श्री गणेसाय नमः’ से शुरू होती है और दूसरी ज्वालाजी (जवालाजी) को स्मरण करती है। इस पर विक्रम संवत 1802 की तारीख है जो 1745-46 ईस्वी के बराबर है।

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– 1975 में इसे एक संग्रहालय बना दिया गया और अब इसे देखने हर साल लगभग 15 हजार सैलानी आते हैं। 1998 में यूनेस्को ने इसे वर्ल्ड हैरिटेज साइट के लिए नॉमिनेट किया था। इसके बाद 2007 में अजरबैजान के प्रेसिडेंट ने इसे एक राष्ट्रीय हिस्टॉरिकल आर्किटेक्चर रिजर्व एरिया घोषित कर दिया गया।

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